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भागवत में सूर्यदेव का रथ और गति (संक्षेप में)

(मुख्य संदर्भ: श्रीमद्भागवतम्, स्कंध 5, अध्याय 21–23)

  • 1. सूर्यदेव का स्वरूप
  • सूर्य केवल ग्रह नहीं, देवता (सूर्य नारायण) हैं
  • इन्हें माना गया है:
  • भगवान की नेत्र रूप शक्ति
  • काल (Time) के नियंता
  • जीवन, प्रकाश और ऊर्जा के स्रोत
  • 2. (a) एक पहिया (काल चक्र)
  • यह एक वर्ष (संवत्सर) का प्रतीक है
  • इसमें शामिल:
  • 12 महीने
  • 6 ऋतुएँ

(b) तीन धुरी (Axles)

  • तीन समय दर्शाते हैं:
  • प्रातः (सुबह)
  • मध्याह्न (दोपहर)
  • सायं (शाम)

(c) सात घोड़े

  • ये प्रतीक हैं:
  • सात वैदिक छंद (गायत्री, त्रिष्टुप आदि)
  • साथ ही संकेत देते हैं:
  • सूर्य के सात रंग (इंद्रधनुष)

(d) सारथी – अरुण

  • सूर्य के रथ को चलाते हैं
  • विशेष बात: इनके पैर नहीं बताए गए हैं
  • यह उदय (sunrise) का भी प्रतीक हैं
  • 3. सूर्य की गति

(a) मेरु पर्वत के चारों ओर

  • सूर्य घूमते हैं:
  • मेरु पर्वत के चारों ओर
  • इससे पृथ्वी पर दिन-रात का क्रम बनता है

(b) दिन और रात

  • जहाँ सूर्य दिखता है → दिन
  • जहाँ नहीं दिखता → रात
  • सूर्य हमेशा गतिमान हैं (कभी रुकते नहीं)

(c) उत्तरायण और दक्षिणायण

  • उत्तरायण (उत्तर की ओर गति)

दिन बड़े होते हैं

  • दक्षिणायण (दक्षिण की ओर गति)

दिन छोटे होते हैं

यह ऋतुओं (seasons) का कारण है

(d) समय का संचालन

सूर्य ही निर्धारित करते हैं:

  • मुहूर्त
  • दिन
  • मास
  • ऋतु
  • वर्ष

इसलिए सूर्य को काल का चक्र चलाने वाला कहा गया है

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