Bhagwatam · Article
भाद्रपद मास के पर्व
हिंदू परंपरा में मुख्यतः चंद्र अथवा चांद्र-सौर पंचांग का अनुसरण किया जाता है, जिसमें वर्ष को बारह चंद्र मासों में विभाजित किया गया है—
चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।
बारह चंद्र मासों को मिलाकर लगभग 354 दिन होते हैं, जो सौर वर्ष से लगभग 11 दिन कम हैं। चंद्र मासों और ऋतुओं के बीच सामंजस्य बनाए रखने के लिए लगभग 32–33 महीनों में एक बार, अर्थात लगभग हर तीन वर्ष में, एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है जिसे अधिक मास कहते हैं।
इनमें श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक विशेष रूप से सुंदर और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध मास हैं। ये पर्वों, व्रतों, पूजा-अर्चना, भगवान के स्मरण तथा परिवार और समाज के साथ मिलकर आनंद मनाने के अनेक अवसर प्रदान करते हैं।
भाद्रपद के प्रमुख पर्व
भाद्रपद मास सामान्यतः अगस्त–सितंबर के दौरान आता है और इसमें अनेक महत्वपूर्ण पर्व एवं धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य प्राकट्य का उत्सव है। यह हमें उनके उस आश्वासन की याद दिलाती है कि जब-जब धर्म की हानि होती है, तब वे धर्म की पुनर्स्थापना और सज्जनों की रक्षा के लिए अवतरित होते हैं।
नंदोत्सव जन्माष्टमी के पश्चात गोकुल में श्रीकृष्ण के जन्म की प्रसन्नता में मनाए गए आनंदोत्सव का स्मरण है।
हरतालिका तीज विशेष रूप से भारत के अनेक भागों में महिलाओं द्वारा मनाई जाती है। यह माता पार्वती की भगवान शिव के प्रति अनन्य निष्ठा, तपस्या और उनके दिव्य मिलन से जुड़ी है।
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के प्राकट्य का उत्सव है। वे विघ्नहर्ता, बुद्धि और विवेक के देवता तथा प्रत्येक शुभ कार्य के मंगलमय आरंभ के प्रतीक हैं।
ऋषि पंचमी उन महान ऋषियों के स्मरण और सम्मान का दिन है जिन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे आध्यात्मिक ज्ञान को सुरक्षित रखा और आगे पहुँचाया।
राधाष्टमी श्री राधारानी के दिव्य प्राकट्य का उत्सव है। श्रीराधा परम प्रेम, सर्वोच्च भक्ति और भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेम-शक्ति की मूर्त अभिव्यक्ति हैं।
अनंत चतुर्दशी भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना से जुड़ी है। अनेक स्थानों पर इसी दिन गणेश विसर्जन के साथ गणेशोत्सव का समापन भी होता है।
भाद्रपद हमें पितृ पक्ष की ओर भी ले जाता है—वह पवित्र काल जब हम अपने दिवंगत पूर्वजों को कृतज्ञता से स्मरण करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करते हैं।
एक परम सत्य—अनेक दिव्य रूप
जब पर्व श्रद्धा, भक्ति, संयम और समझ के साथ मनाए जाते हैं, तो वे हमारे जीवन में प्रसन्नता लाते हैं और मानसिक तथा सामाजिक स्वास्थ्य को भी समृद्ध करते हैं।
हममें से अधिकांश ईश्वर में विश्वास रखते हैं, लेकिन कभी-कभी पर्याप्त ज्ञान और गहरी समझ के अभाव में मन में प्रश्न उठते हैं। ऐसा ही एक सामान्य प्रश्न है—
“हिंदुओं के इतने सारे भगवान क्यों हैं?”
हिंदू दर्शन का गहरा भाव यह नहीं है कि अनेक अलग-अलग ईश्वर आपस में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। विभिन्न हिंदू परंपराएँ एक परम सत्य को अनेक नामों, रूपों और शक्तियों के माध्यम से समझने और उसकी उपासना करने का मार्ग देती हैं।
ऋग्वेद का प्रसिद्ध वचन इस भाव को बड़ी सुंदरता से व्यक्त करता है— एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
अर्थात— “सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।”
इसीलिए विभिन्न परंपराओं में उसी परम दिव्यता की उपासना श्रीकृष्ण, श्रीराम, शिव, विष्णु, गणेश तथा अनेक अन्य दिव्य रूपों में की जाती है।
इसी प्रकार परमात्मा की दिव्य शक्ति की आराधना राधा, सीता, लक्ष्मी, दुर्गा, पार्वती और सरस्वती आदि रूपों में की जाती है।
इसे एक सरल उदाहरण से समझ सकते हैं। सूर्य और सूर्य के प्रकाश के बारे में सोचिए। सूर्य का प्रकाश सूर्य से अलग नहीं है; वह सूर्य की ही ऊर्जा है जो चारों ओर फैलती है। उसी प्रकार परमात्मा और उनकी दिव्य शक्ति का गहरा और अभिन्न संबंध है।
अलग-अलग दार्शनिक परंपराएँ इस संबंध को अलग-अलग ढंग से समझाती हैं, किंतु वे हमें बाहरी विविधता के पीछे स्थित एक दिव्य सत्य को देखने की प्रेरणा देती हैं।
हमारे पर्वों की सुंदरता
जैसे-जैसे मेरी आयु बढ़ रही है, मुझे वर्ष भर इतने सारे पर्व मनाने के पीछे छिपी सुंदरता और गहरी समझ का अधिक अनुभव होने लगा है।
जीवन अपने साथ जिम्मेदारियाँ, तनाव, निराशाएँ और कभी-कभी अपनों के बिछुड़ने का दुःख भी लाता है। ऐसे में हमारे पर्व समय-समय पर हमें दैनिक चिंताओं से ऊपर उठने का अवसर देते हैं।
हम घर सजाते हैं, विशेष भोजन बनाते हैं, अच्छे वस्त्र पहनते हैं, मंदिर जाते हैं, भजन और प्रार्थना करते हैं, परिवार और मित्रों से मिलते हैं, अपनी परंपराओं को याद करते हैं और—सबसे महत्वपूर्ण—भगवान का स्मरण करते हैं।
हर पर्व अपने भीतर एक संदेश लिए हुए है।
जन्माष्टमी हमें दिव्य प्रेम और धर्म का स्मरण कराती है।
गणेश चतुर्थी किसी भी कार्य को आरंभ करने से पहले विवेक और सद्बुद्धि की आवश्यकता बताती है।
राधाष्टमी हमें निर्मल और निष्काम प्रेम-भक्ति की सुंदरता सिखाती है।
और पितृ पक्ष हमारे भीतर उन पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जगाता है जिनके कारण आज हमारा अस्तित्व है।
इस दृष्टि से हमारे पर्व केवल छुट्टियाँ या धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं। वे जीवन में आनंद, उत्साह, अपनापन और पारिवारिक-सामाजिक जुड़ाव लाते हैं और बार-बार हमें परमात्मा से जोड़ते हैं।
शायद हमारे पर्वों की सबसे बड़ी सुंदरता यही है कि जीवन की निरंतर भागदौड़ के बीच वे हमें कुछ क्षण रुकने, आनंद मनाने, कृतज्ञ होने और भगवान को याद करने का अवसर देते हैं।
और अंततः यह स्मरण कराते हैं कि—
यह जीवन स्वयं भगवान का दिया हुआ एक अनमोल उपहार है।
राधे राधे!