Bhagwatam · हिन्दी · Poetry

Bhagwatam · हिन्दी · Poetry

दैवी गुण ले जाते हैं मुक्ति के दिव्य मार्ग पर, जबकि आसुरी गुण बाँधते हैं जीव को निरन्तर।

हिन्दी काव्य संग्रह

परन्तु हे अर्जुन! तुम किसी प्रकार का शोक न करो, दैवी गुणों से सम्पन्न जन्मे हो — इस सत्य को हृदय में धरो।

१६.६

इस संसार में दो प्रकार की प्रकृतियाँ मानी गई हैं — दैवी और आसुरी, हे अर्जुन, दैवी गुणों का विस्तार से कह चुका हूँ, अब आसुरी स्वभाव के विषय में सुन।

१६.७

जो आसुरी प्रकृति से युक्त हैं, वे नहीं समझते उचित-अनुचित कर्म, क्या करना और क्या न करना — नहीं जानते जीवन का धर्म।

न उनमें पवित्रता, न सदाचार, न सत्यता होती किंचित, आसुरी स्वभाव में उनका जीवन रहता अज्ञान से सिंचित।

१६.८

वे कहते हैं — यह संसार परम सत्य से है रहित, आधारहीन है और ईश्वर से भी है रहित।

स्त्री-पुरुष के परस्पर संयोग से ही हुआ है यह उत्पन्न, कामेच्छा के अतिरिक्त इसका कोई कारण नहीं अन्य।

१६.९

ऐसे विचारों को अपनाकर अल्पबुद्धि जन होते पथभ्रष्ट, क्रूर कर्मों में लगकर करते जग का कल्याण नष्ट।

संसार के शत्रु बनकर करते विनाशकारी कर्मों को धारण, अपनी उग्र प्रवृत्तियों से बनते उसके विनाश का कारण।

१६.१०

अतृप्त कामनाओं में आसक्त, दम्भ और अभिमान में चूर, आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य रहते सत्य से बहुत दूर।

मोहवश झूठे सिद्धान्तों को मानकर होते अशुद्ध संकल्पों में आसक्त, क्षणभंगुर विषयों में उलझे रहते, कामनाओं से होकर ग्रस्त।

१६.११

अंतहीन चिंताओं में डूबे रहते जीवन के अंतिम क्षण तक, फिर भी विषय-भोग को ही परम लक्ष्य मानते हैं अन्त तक।

उनके लिए जीवन का उद्देश्य है कामनाओं की तृप्ति और धन-संचय, इसी को सर्वोच्च मानकर जीते हैं वे निश्चिन्त और असंशय।

१६.१२

सैकड़ों आशाओं और कामनाओं के बंधनों में होकर ग्रसित, काम और क्रोध से प्रेरित, इन्द्रिय-तृप्ति में रहते आसक्त।

विषय-भोग की पूर्ति के लिए धन-संग्रह में रहते तल्लीन, अन्यायपूर्ण साधनों से धन पाकर भी नहीं होते कामनाहीन।

१६.१३–१६.१५

आसुरी स्वभाव वाला सोचता — “आज मैंने इतनी सम्पत्ति पाई, अपनी और भी कामनाएँ पूरी करूँगा — ऐसी योजना बनाई।

यह सब मेरा है और आगे होगा मेरे पास और अधिक धन, एक शत्रु को नष्ट किया, अन्य शत्रुओं का भी करूँगा दमन।

मैं ही स्वामी, मैं ही भोक्ता, सिद्ध, शक्तिशाली और सुखी अपार, मैं धनवान और कुलीन हूँ — कौन है मेरे समान संसार?

मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और सुखों का करूँगा भोग।” इस प्रकार अज्ञान के कारण मोहग्रस्त रहते आसुरी लोग।

१६.१६

ऐसी अनेक कल्पनाओं से भ्रमित, मोह के जाल में फँस जाते, विषय-भोग की तृप्ति में आसक्त होकर अपना विवेक गँवाते।

कामनाओं और भोगों में डूबे रहते हर पल, अन्ततः गिरते हैं वे घोर और अशुद्ध नरक में जाकर।

१६.१७

आत्म-अभिमानी और हठी, धन और प्रतिष्ठा के मद में चूर, ऐसे लोग अहंकार में रहते सत्य और विनम्रता से दूर।

नाममात्र के यज्ञ करते हैं दम्भ और आडम्बर के साथ, शास्त्र-विधि की उपेक्षा करके चलते अपने मन के पथ पर।

१६.१८

अहंकार, बल, दर्प, कामना और क्रोध से होकर अंधे, द्वेष के कारण सत्य और परमात्मा से रहते बंधे।

अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से करते द्वेष, अज्ञानवश मेरी निन्दा करते — यही है उनके आसुरी भाव का विशेष।

१६.१९–१६.२०

ऐसे द्वेषी, क्रूर और अधम मनुष्यों को संसार के आवागमन में, मैं बार-बार डालता हूँ आसुरी प्रकृति वाले गर्भों में।

आसुरी योनियों में जन्म लेकर वे बारम्बार आते, मुझको प्राप्त न करके और भी अधम गति को जाते।

हे अर्जुन! इस प्रकार मोह और अज्ञान में रहते आसक्त, जन्म-जन्मान्तर में नीचे गिरते, परम लक्ष्य से रहते विरक्त।

१६.२१

जीव के आत्म-विनाश और नरक की ओर ले जाने वाले हैं तीन द्वार — काम, क्रोध और लोभ; इसलिए त्यागो इन तीनों को बारम्बार।

१६.२२

जो इन तीन अंधकारमय द्वारों से स्वयं को मुक्त कर पाता, वह अपने परम कल्याण के लिए शुभ आचरण अपनाता।

इस प्रकार आत्मोन्नति के पथ पर बढ़ता जाता निरन्तर, और अन्ततः प्राप्त करता है परम गति का दिव्य अवसर।

१६.२३

जो कामनाओं के आवेग में मनमाने कर्म करते जाते, शास्त्रों के विधि-विधानों को जीवन में नहीं अपनाते।

न सिद्धि, न सुख उन्हें जीवन में प्राप्त हो पाता, और न परम लक्ष्य की मंज़िल तक उनका पथ पहुँच पाता।

१६.२४