Bhagwatam · हिन्दी · Poetry
वैदिक मंत्र इसके पत्ते हैं — ऐसा इसका गूढ़ विधान, जो इस वृक्ष के रहस्य को जाने, वही है वेदों का सच्चा ज्ञानवान।
हिन्दी काव्य संग्रह
१५.२
इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर-नीचे फैलीं, त्रिगुणों से होतीं पोषित, इन्द्रिय-विषय इसकी कोपलें हैं, जिनसे जीव रहता आकर्षित।
इसकी जड़ें नीचे भी फैलकर मनुष्य-लोक में होतीं विस्तारित, कर्मों के बंधन में जीव को रखतीं, संसार में करतीं आबद्ध और प्रभावित।
१५.३–१५.४
इस संसार-वृक्ष का वास्तविक स्वरूप यहाँ नहीं होता दृष्टिगोचर, न इसके आदि, न अन्त, न आधार का ज्ञान होता सहज प्रखर।
अतः दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र से इसकी गहरी जड़ों को काटो, फिर उस परम पद की खोज करो और प्रभु की शरण को अपनाओ।
जहाँ पहुँचकर जीव फिर इस मायिक संसार में लौटकर नहीं आता, उस आदि पुरुष की शरण ग्रहण करो, जिससे यह सनातन प्रवाह चला आता।
१५.५
अभिमान और मोह से मुक्त, जिन्होंने आसक्ति पर पाई विजय, जो निरन्तर अध्यात्म में स्थित रहते, उनका जीवन होता निर्भय।
कामनाओं से मुक्त, सुख-दुःख के द्वन्द्वों से जो रहते परे, ऐसे मुक्त ज्ञानी मेरे अविनाशी परम धाम को प्राप्त करें।
१५.६
न सूर्य, न चन्द्रमा और न अग्नि मेरे परम धाम को करते प्रकाशित, वह स्वयं दिव्य प्रकाश से सदा रहता है आलोकित।
उस परम धाम को प्राप्त कर जीव फिर संसार में नहीं लौटता, जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर परम अवस्था को प्राप्त होता।
१५.७
इस जीव-जगत में स्थित प्रत्येक जीव है मेरा सनातन अंश, पर प्रकृति के बंधन में संघर्ष करता, यही है उसका सांसारिक वंश।
मन सहित छह इन्द्रियों को साथ लेकर रहता वह संघर्षरत, माया के संसर्ग में पड़कर भौतिक जीवन में रहता आबद्ध सतत्।
१५.८
जैसे वायु पुष्पों से सुगन्ध लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान जाती, वैसे ही जीवात्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाती।
मन और इन्द्रियों को भी अपने साथ लेकर आगे बढ़ती है, शरीर बदलता रहता है, पर जीव की यात्रा चलती रहती है।
१५.९
कान, आँख, त्वचा, जिह्वा और नासिका के साथ मन को अधिष्ठित कर, देहधारी जीव इन्द्रिय-विषयों का अनुभव करता है निरन्तर।
इन इन्द्रियों के माध्यम से विषयों का करता वह आस्वादन, और प्रकृति के संसर्ग में चलता रहता उसका सांसारिक जीवन।
१५.१०
अज्ञानी जन आत्मा का शरीर में रहना और शरीर से जाना नहीं समझ पाते, न गुणों के प्रभाव में उसके इन्द्रिय-विषयों के भोग को जान पाते।
पर जिनके ज्ञान-चक्षु खुल चुके, वे इस सत्य को स्पष्ट देखते, जीव की स्थिति और उसकी यात्रा को ज्ञान के प्रकाश में समझते।
१५.११
प्रयत्नशील योगी अपने भीतर स्थित आत्मा को देख पाते, शुद्ध अन्तःकरण से वे इस दिव्य सत्य का अनुभव कर पाते।
पर जिनका अन्तःकरण अभी शुद्ध और संयमित नहीं हुआ, प्रयत्न करने पर भी उनके लिए आत्मतत्त्व स्पष्ट नहीं हुआ।
१५.१२
सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को करता प्रकाशित, जानो वह मेरा ही तेज है, जिससे विश्व होता आलोकित।
चन्द्रमा की शीतल आभा और अग्नि की दीप्ति जो दिखाई देती, हे अर्जुन! जानो वह समस्त ज्योति भी मुझसे ही है आती।
१५.१३
पृथ्वी में प्रवेश कर अपनी शक्ति से सभी जीवों को मैं धारण करता, अपनी दिव्य सामर्थ्य से सम्पूर्ण जगत का पोषण करता।
पोषक चन्द्रमा बनकर औषधियों और वनस्पतियों में रस भरता, इस प्रकार अपनी शक्ति से समस्त जीवन का पालन करता।
१५.१४
सभी जीवों के शरीर में वैश्वानर जठराग्नि बनकर मैं रहता, प्राण और अपान से संयुक्त होकर भोजन को पचाता रहता।
चार प्रकार के भोजन का पाचन मुझसे ही होता है सम्पन्न, श्रीकृष्ण कहते हैं — मेरे द्वारा ही शरीर रहता पोषित और प्रसन्न।
१५.१५
समस्त जीवों के हृदय में मैं ही करता हूँ निवास, मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति का होता है प्रकाश।
समस्त वेदों द्वारा केवल मैं ही हूँ जानने योग्य, मैं वेदान्त का रचयिता और वेदों के वास्तविक अर्थ का ज्ञाता हूँ पूर्णयोग्य।
१५.१६
इस संसार में दो प्रकार के पुरुष कहे गए — क्षर और अक्षर, समस्त भौतिक प्राणी क्षर हैं, जबकि कूटस्थ कहलाता अक्षर।
एक परिवर्तनशील जगत में नश्वर रूप से होता प्रकट, दूसरा परिवर्तन से परे स्थिर रहता, अविचल और अक्षत।
१५.१७
इन दोनों से परे एक अन्य सर्वोच्च पुरुष है — परमात्मा महान, अविनाशी ईश्वर रूप में तीनों लोकों में करता प्रवेश और विधान।
वही तीनों लोकों को धारण कर उनका पालन-पोषण करता, अव्यय परमेश्वर बनकर सम्पूर्ण सृष्टि को संभालता।
१५.१८
मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी सर्वोच्च महान, इसीलिए पुरुषोत्तम के रूप में जग में मेरी है पहचान।
वेदों और लोक में मैं परम पुरुष के रूप में हूँ विख्यात, क्षर-अक्षर से परे पुरुषोत्तम — यही मेरा दिव्य तत्त्व प्रख्यात।
१५.१९
जो मोह और संशय से मुक्त होकर मुझे पुरुषोत्तम रूप में जानता, हे भरतवंशी! वह वास्तव में मेरे सम्पूर्ण स्वरूप को पहचानता।
ऐसा ज्ञानी पूर्ण भाव से मेरी भक्ति में रहता युक्त, सर्वभाव से मेरा भजन करता, प्रेम और श्रद्धा में होकर मुक्त।
१५.२०
हे निष्पाप अर्जुन! मैंने तुम्हें यह परम गुह्य शास्त्र समझाया, जिसे जानकर मनुष्य बुद्धिमान होता और जीवन का मर्म है पाया।
इस रहस्य को समझकर मनुष्य होता है कृतकृत्य और प्रबुद्ध, अपने जीवन के परम प्रयोजन को प्राप्त करता, अन्तःकरण होता शुद्ध।
॥ काव्यात्मक भगवद्गीता ॥
अध्याय १६ — दैवासुर-सम्पद्-विभाग योग
दैवी और आसुरी स्वभाव का विवेचन
१६.१–१६.३
परम पुरुषोत्तम भगवान ने कहा — हे भरतवंशी! निर्भयता, मन की शुद्धि, आध्यात्मिक ज्ञान में दृढ़ता, दान और इन्द्रिय-संयम की सिद्धि।
यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता और अहिंसा का व्यवहार, सत्यता, क्रोधहीनता और त्याग — ये दिव्य गुण अपार।
शान्ति, दोषारोपण से मुक्ति, सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव, लोभ से मुक्ति, भद्रता, लज्जा और चंचलता का अभाव।
तेज, क्षमाशीलता, धैर्य, पवित्रता और शत्रुता से मुक्ति, अभिमान से रहित होना — ये हैं दैवी सम्पदा की युक्ति।
हे अर्जुन! ये सभी श्रेष्ठ और पावन गुण, दैवी प्रकृति से सम्पन्न मनुष्यों के हैं लक्षण।
१६.४
हे पृथा-पुत्र! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध और कठोरता, अज्ञान सहित ये आसुरी प्रकृति के गुण हैं सर्वथा।